वैसे राजन-साजन मिश्र अपने पिता से ज्यादा विख्यात हुए, पर मैंने उनसे पहले उनके पिता को ही सुना था क्योंकि मुझे सारङ्गी सुनना अच्छा लगता है। छन्नुलालमिश्र का एक interview सुनते समय बच्चालालमिश्र का नाम सुना, उनको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं sarangi.net पर पहुँचा और वहाँ हनुमानप्रसादमिश्र मिल गए।

Speaking of राजन and साजन मिश्र, I initially avoided hearing them, because I was trying to find their father’s voice in them. हनुमानप्रसादजी’s voice had a pathos which his sons were unable to acquire. But this type of thinking is in vain, they are their own artists. I now enjoy hearing them.

I have reached to a point where I can subconsciously recognise some of the रागs. This was not the case at all some time ago. I was humming the बन्दिश, “ऐसो नवल लाडली राधा” in राग जयजयवन्ती sung by राजन-साजन मिश्र, while humming it I instinctively linked it with “जिया में लागे आन-बान” (again the version I heard was by राजन-साजन मिश्र) in गारा due to them being similar in nature. The number of रागs I recognise right now is a very small amount though. They are:

  • मियाँ की मल्हार
  • गारा
  • जयजयवन्ती
  • दरबारी
  • भैरवी
  • झिञ्झोटी
  • बहार

Though I did notice that दरबारी and जौनपुरी sounded similar, and they were! Pretty neat if I say so myself.

कुछ दिनों पहले पता चला कि अमीरख़ान ने ग़ज़ल गाई है, और क्या ग़ज़ल गाई है! इस ग़ज़ल को मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा है। पूरी ग़ज़ल:

رہیے اب ایسی جگہ چل کر جہاں کوئی نہ ہو
ہم سخن کوئی نہ ہو اور ہم زباں کوئی نہ ہو

بے درودیوار سا اک گھر بنایا چاہیے
کوئی ہم سایہ نہ ہو اور پاسباں کوئی نہ ہو

پڑیے گر بیمار تو کوئی نہ ہو بیمار دار
اور اگر مر جائیے تو نوحہ خواں کوئی نہ ہو
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई ना हो
हम-सुख़न कोई ना हो और हम-ज़बाँ कोई ना हो

बे-दर--दीवार सा एक घर बनाना चाहिए
कोई हम-साया ना हो और पासबाँ कोई ना हो

पड़िए गर बीमार तो कोई ना हो बीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई ना हो

सुनने में आता है कि ये अमीरख़ान की इकलौती recorded ग़ज़ल है। ये शायद राग शहाना में है।

ग़ालिब अभी अपने साथियों से नाराज़ नज़र आते हैं। इस ग़ज़ल के बारे में और पढ़ने के लिए इधर जाएँ।

NFAK’s ਕਿਸੇ ਦਾ ਯਾਰ ਨਾ ਵਿਛੜੇ sounds charmingly of the 90s. Another interesting thing I noticed were the lines “ਰਾਂਝੇ ਵਰਗੇ ਇਸ਼ਕ ਦੇ ਰੋਗੀ ਕੰਨ ਪੜਵਾ ਕੇ ਬਣ ਗਏ ਜੋਗੀ”, referring to the कनफड़वाs or the योगीs of the नाथ सम्प्रदाय।

लोग बोलते हैं कि चन्द्रकौंस में वो “haunted” भाव है, मुझे धनकोनी कल्याण सुनकर भी ऐसा लगता है। जैसे की: मन विहारी मोहन विहारी - ख़याल - जितेन्द्र अभिषेकी, रङ्ग पैराहन का - ग़ज़ल - मेहदी हसन और शहनाई - ख़याल - शैलेश भागवत

बचपन से ही मुझे दाढ़ी-मूछ रखने का बहुत शौक था, रवीन्द्रनाथठाकुर या राजारविवर्मा के परशुराम चित्र जैसी। बड़े ग़ुलामअलीख़ान की भी मूछे बड़ी शानदार हैं, पर खैर मेरी कभी उस तादाद में दाढ़ी-मूछ उगी ही नहीं।

कभी-कभार विलम्बित सुनते समय तबले की एक एक थाप सीने पर चोट करती है।